Dadi Gori

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Jai Dadi Gori mandir, Daya

Jai Dadi Gori mandir, Daya

Jai Dadi Gori mandir, Daya

सन १५०५ (1505) की बात है | रामा नाम का ब्राह्मण था | वह हरियाणा राज्य के हिसार जिले के एक गाँव का रहने वाला था |एक दिन उस के मन में विचार आया की वह घुमने के लिए मथुरा-वृन्दावन चला जाए| सोच की वहां तीर्थ-संनान हो जाएगा और बेलगाडी मैं माल भी भर कर ले आउंगा | उसके पास में दो बेलो की बेलगाडी थी| वह मथुरा-वृन्दावन के लिए रवाना हो गया | मथुरा-वृन्दावन के तीर्थ-स्थान को यात्रा करने के बाद में वह माल खरीद कर बैलगाड़ी में भरता हैं और घर को चल पड़ता है| जैसे ही गह कुछ दुरी का सफ़र तय करता हैं संध्या का समय हो जाता हैं | एक जगह पर वहा क्या देखता हैं | बहुत सरे बच्चे वहा पर खेल रहे होते हैं | सभी बच्चे खेलकर अपने-२ घर को चले जाते हैं | लेकिन एक छोटी सी कन्या वहीँ पर ही रह जाती हैं| जिसकी उम्र ७ (7) वर्ष की होती हैं| वह रामा ब्राह्मण को देखकर जोर-२ से रोने लगीं हैं| उस कन्या को एसे रोते देख कर उसे अपने पास बुलाया और कन्या से कहता हैं की हे बेटी ! सब बच्चे खेल-कूद कर अपने घर चले गए हैं, लेकिन तुम यहाँ क्या कर रही हो | तुम्हार माता-पिता तुम्हारी रह देख रहें होगें | तुम भी अपने घर चली जाओ| यह सुन कर कन्या करती हैं की हे बाबा ! मेरे पास घर-बार कुछ भी नहीं और न ही माँ-बाप है और ना ही परिवार हैं कहती हैं की मेरा इस दुनिया में कोई नहीं हैं | मैं तो आकाशा से सीधी धरती परआ रुकी हूँ| अब तो आप ही हेमे घर्म के पिता बन जाइए| राम ब्राह्मण को उस कन्या पर तरस आ गया और उस कन्या को अपने घर्म बेटी बना लिया | राम ब्राह्मण उसे अपनी बैलगाड़ी में बैठा कर घर की तरफ चल पड़ा | वह गाँव जाकर अपने परिवारजनों को सारी घटना सुनाता हैं | की उसके साथ एक छोटी – सी असाधारण कन्या आई हैं | वह कन्या को दिखाने के लिए अपने घरवालो और गाँव वालो को वहां पर जाता है| वहा छोटी सी कन्या कहती हैं – मैं यहाँ पर रामा ब्राह्मन के साथ आई हूँ , वह मेरे पिता हैं | मैं नाग की पुत्री हूँ और स्वयं श्री कृष्ण भगवन ने मुझे इस कलयुग मैं आपके कल्याण के लिए भेजा हैं और मैं इशी गाँव मैं ही रहना चाहती हूँ|मैं आप सब गाँव वालो को वचन देती हूँ की मैं सर्प के कांटे हुए को मरने नहीं दुगी| मेरा नामे ले कर कच्चे घागे की सात गांठे लगाकर बाँध लेना व मेरा मंदिर में आना| मैं उसे मरने नहीं दुगी| सच्चे दिल से नवमी को मेरी खीर चूरमे की कडाही करना | छोटी कन्या को भोजन देना अँधेरी नवमी को नित्य घी की ज्योति लगाना | सच्चे दिल से जो मुझे पूजे गा मैं उसकी हर मनोकामना पूर्ण करुगी | इतना कहकर वो चुप हो गई व झाड़ी में समां गई| उसी दिन से उनकी मानता और पूजा शुरू हुई और वो दादी गौरी के नाम से विख्यात हुई |